
नवरात्रि में माता की एक झलक पाने उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
चांपा। कोसा कांसा और कंचन अपनी समृद्ध व्यापारिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध चांपा की पहचान केवल आर्थिक वैभव तक सीमित नही है। इस नगर की आत्मा में सदियों से रची-बसी धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक मान्यताएं भी इसकी विशिष्ट पहचान हैं। चांपा नगर के देवांगन मोहल्ले में स्थित मां समलेश्वरी देवी मंदिर इसी गौरवशाली परंपरा का प्रमुख केंद्र है। चांपा के लोगों की कुलदेवी के रूप में पूजित मां समलेश्वरी का दरबार पीढ़ियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। नवरात्रि के दिनों में माता की एक झलक पाने के लिए उमड़ने वाली भक्तों की भीड़ इस अटूट विश्वास की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करती है। मां समलेश्वरी मंदिर का इतिहास चांपा की जमींदारी परंपरा और तत्कालीन राजपरिवार की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा माना जाता है। प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार, माता समलेश्वरी की स्थापना देवांगन मोहल्ले और सोनार मोहल्ले के बीच स्थित एक छोटे से मंदिर में हुई थी। इसके बाद संबलपुर की आराध्य देवी मां समलेश्वरी को चांपा की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित करने की परंपरा विकसित हुई। मान्यता है कि प्रारंभिक दौर में यहां काष्ठ प्रतिमा की पूजा-अर्चना की जाती थी। कालांतर में चांपा के तत्कालीन जमींदार परिवार के पूर्वज संबलपुर क्षेत्र से काले पत्थर से निर्मित माता की प्रतिमा लेकर आए और उसे मंदिर में प्रतिष्ठित कराया। इसी के साथ मंदिर की धार्मिक महत्ता और जनआस्था का विस्तार होता गया। समय के साथ मां समलेश्वरी का मंदिर किसी एक परिवार की आस्था का केंद्र न रहकर पूरे चांपा नगर और आसपास के क्षेत्रों के श्रद्धालुओं का प्रमुख धार्मिक स्थल बन गया। यहां माता के प्रति लोगों का विश्वास पारिवारिक और सामाजिक परंपराओं में भी दिखाई देता है। विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर नवदंपति माता के दर्शन कर अपने नवजीवन की शुरुआत करते हैं। नगरवासियों की मान्यता है कि शुभ कार्य से पहले मां के चरणों में शीश नवाने से जीवन में सुख, समृद्धि और मंगल बना रहता है। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पारिवारिक विरासत से जोड़ने का माध्यम भी है। मां समलेश्वरी मंदिर में चैत्र और क्वांर नवरात्रि का विशेष महत्व है। इन दोनों अवसरों पर मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है और श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति तथा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए ज्योति कलश प्रज्ज्वलित कराते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों तक मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहता है। माता के जयकारों, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा क्षेत्र आस्थामय हो उठता है नवरात्रि के दौरान माता के दर्शन के लिए दूर-दराज से भी श्रद्धालु चांपा पहुंचते हैं। भक्तों की बढ़ती आवाजाही के बीच मंदिर परिसर में दिनभर चहल-पहल बनी रहती है। अनेक श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर कठिन धार्मिक संकल्पों का पालन करते हुए माता के दरबार तक पहुंचते हैं। भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद माता के आशीर्वाद से पूरी होती है। नवरात्रि के धार्मिक आयोजनों में ज्योति कलश के साथ जवारा विसर्जन की परंपरा भी विशेष स्थान रखती है। यह परंपरा भक्ति, आस्था और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक है। श्रद्धालु पूरे नौ दिनों तक माता की आराधना करने के बाद विधि-विधान से धार्मिक अनुष्ठानों को पूर्ण करते हैं। जवारा विसर्जन के अवसर पर परंपरागत धार्मिक रीति-रिवाजों के माध्यम से मां के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। मां समलेश्वरी मंदिर चांपा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। समय के साथ नगर का स्वरूप बदला है, व्यापार में विस्तार हुआ है और जीवनशैली में भी अनेक परिवर्तन आए हैं, लेकिन माता के प्रति श्रद्धालुओं का विश्वास आज भी उतना ही दृढ़ है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही पूजा-पद्धतियां, नवरात्रि के आयोजन और मांगलिक कार्यों से जुड़ी परंपराएं इस विरासत को निरंतर आगे बढ़ रही हैं। मां समलेश्वरी का दरबार चांपा के इतिहास, जमींदारी परंपरा, जनविश्वास और सामाजिक जीवन की स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए है। नवरात्रि में माता की एक झलक पाने के लिए उमड़ता श्रद्धा का सैलाब इस बात का प्रमाण है कि नगर का वैभव केवल उसकी आर्थिक समृद्धि में नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक जड़ों और अटूट धार्मिक आस्था में भी बसता है। मां समलेश्वरी चांपा निवासियों के लिए केवल आराध्य देवी नही, बल्कि नगर की पहचान, परंपरा और सामूहिक विश्वास की जीवंत प्रतीक हैं।



