जो हुए महासमुन्द विधानसभा परिषद के प्रथम विधायक
फ्रीडम फाइटर स्व.जीवन गिरी गोस्वामी
लेखक- जसवंत पवार
मूंछो पर ताव जमाते से,जब मांसपेशियां बल खाती,तन पर मछलियां उछल आती।थी भारी भीड़ अखाड़े में,चंदन चाचा के बाड़े में।
नर्मदा प्रसाद खरे जी ने तत्कालीन सी पी एण्ड बरार क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले लभरा कला के मालगुजार जीवन गिरी गोस्वामी के जैसे पहलवानों से ही प्रेरित होकर ही इस कविता को लिखी होगी ऐसा लगता है। फ्रीडम फाइटर स्व.जीवन गिरी गोस्वामी के प्रपौत्र कुबेर प्रकाश गिरी गोस्वामी बतलाते हैं कि उनके परदादा जीवन गिरी गोस्वामी उनके दादा फ्रीडम फाइटर स्व.अरिमर्दन गिरी गोस्वामी के चाचा थे। उनके परदादा जीवन गिरी गोस्वामी को पहलवानी का शौक था, इसलिए उनका अपना अखाड़ा था, ऐसा उनके बुजुर्ग बतलाते थे। उनके अखाड़े में पुराने समय के पहलवानी के सामान गदा, मुदगर, गरनाल, समतोला, मलखंभ, पत्थर का डंबल, रेत की बोरी और अखाड़े की मिट्टी थी। लगभग 6 फीट ऊँचे, तीखे नयन नक्श, सांवला शरीर और मजबूत देहयष्टि के मालिक थे जीवन गिरी गोस्वामी जी। आस-पास के पहलवानों से पहलवानी करते, कभी-कभी तो उनके दादा अरिमर्दन गिरी जो उनके भतीजे थे जीवन गिरी जी के उनके साथ ही अखाड़ा में गुत्थम-गुत्था हो जाते थे। चाचा भतीजे की दांव पेंच को देखने लभराकला के लोग झूम जाते और पहलवानी दांव पेंचों का मजा लेते थे। उनके परदादा का खान-पान सामान्य था वे शुद्ध शाकाहारी थे। उस बखत उनके यहां गोधन की कमी नहीं थी इसलिए खूब गोरस होता था जिसका सेवन कर उनका शरीर बलिष्ठ था। अपनी बलिष्ठ शरीर के उर्जा को उन्होने सविनय अवज्ञा आंदोलन, तमोरा जंगल सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजो के खिलाफ खर्च किया, तो वहीं दूसरी तरफ उन्होने सामाजिक जन चेतना का कार्य भी समर्पित भाव से किया। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, विदेशी वस्तुओं की होली जलाना, शिक्षा के क्षेत्र में कार्य, हरिजन कल्याण, छुआ छुत से मुक्ति दिलाने महिनों घर से बाहर रहते थे। स्व.जीवन गिरी गोस्वामी जी के पोता लभराकला निवासी डोगेन्द्र गिरी गोस्वामी बतलाते हैं कि उनके दादा जी का जन्म 1879 में लभराकला में हुआ था। उनके पिता का नाम पूरन गिरी गोस्वामी था। वे पांच भाईयों में तीसरे नंबर के पुत्र थे। उनकी शिक्षा 4 थी तक थी। वे खट्टी स्कूल के छात्र थे। उस समय यह क्षेत्र साधन-संसाधन विहिन घनघोर जंगल था। डोगेन्द्र आगे बतलाते हैं कि उनके दादा 32 गॉवों के मालगुजार थे और वे उस समय रोड़ावाले गौटिया के नाम से जाने जाते थे। जीवन गिरी गोस्वामी जी काफी वाक पुट, हाजिर जवाब और समझदार व्यक्ति थे। उनके शादी गौरी गोस्वामी जी के साथ हुई। उनके दो पुत्र हुए इंद्रसाय गिरी गोस्वामी और हेमचंद्र गिरी गोस्वामी। इंद्रसाय गिरी के एक पुत्र वे स्वयं डोगेंद्र गिरी है। स्व.जीवन गिरी गोस्वामी जी गांधी जी के समर्थक थे वे उनके विचारधारा से प्रभावित थे। इसलिए सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जब सितम्बर 1930 में तमोरा में जंगल सत्याग्रह हुआ जिसमें वीरांगना दयावती काफी चर्चित हुई, उससे पहले 6 सितम्बर 1930 को इन्ही के मालगुजारी गॉंव लभराकला में जंगल सत्याग्रह को लेकर जनसभा हुई थी। पोता डोगेन्द्र और प्रपौत्र कुबेर प्रकाश बतलाते हैं कि स्व.जीवन गिरी गोस्वामी महासमुन्द विधान परिषद के प्रथम मनोनीत विधायक थे। 1935 के भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत मध्य प्रांत और बरार में विधान परिषद का चुनाव 1937 में हुए थे और इसके बाद पहली कैबिनेट का गठन किया गया था। इसी विधान परिषद के महासमुन्द के वे प्रथम मनोनित विधायक थे। अंगे्रजी हुकुमत के समय 1946 में वे एक बार फिर से निर्वाचित विधायक हुए। उस बखत चुनाव के लिए वयस्क मताधिकार नागरिकों को मिला नहीं था इसलिए तय और सीमित मताधिकार प्राप्त मतदाताओं ने उसका निर्वाचन किया था। इस तरह से अंग्रेजी शासनकाल में जीवन गिरी गोस्वामी जी, सी पी एण्ड बरार क्षेत्र से 1937 और 1946 में महासमुन्द विधान परिषद से दो बार विधायक हुए हैं। इसकी पुष्टी महाकोशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सभापति, गोंविद दास के द्वारा दिनिांक 15 अगस्त 1947 को जारी ताम्रपत्र करता है।जीवन गिरी गोस्वामी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया जिसके चलते उन्हें कई बार जेल जाना हुआ और उन्हें अंग्रेजी प्रताणना का शिकार होना पड़ा। उन्हें एक बार डिफेन्स आँफ इंडिया रूल्स अधिनियम की धारा 38(5) डी.आई.आर. के अंतर्गत 05.08.1941 को गिरफ्तार कर रायपुर केन्द्रीय जेल भेज दिया गया, फिर 06.08.1941 को नागपुर केन्द्रीय कारागार में स्थानांतरित किया गया। वहां पर गोस्वामी जी को 07.08.1941 से 27.10.1941 तक रख कर रिहा किया गया। यहां पर यह बतलाना लाजिमी होगा कि अंग्रेजी सरकार ने डिफेन्स आॅफ इण्डिया रूल्स डी.आई.आर. 1941 यह एक्ट 1939 को बनाए थे जिसमें धारा 38(5) ऐसी रिपोर्ट या जानकारी फैलाने से था जो सरकार के लिए हानिकारक हो। और गोस्वामी जी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए जनजागरण, विरोध और रैली कर रहे थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के भी वे हिस्सा रहे हैं। ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण कारावास की त्यागपूर्ण कष्ट साधना के चलते उन्हें 15 अगस्त 1947 को महाकोशल प्रान्तीय कांग्रेस कमेटी जबलपुर ने ताम्रपत्र प्रदान कर सम्मानित किया। महासमुन्द खित्ते के फ्रीडम फाइटर और विधान परिषद के प्रथम विधायक जीवनगिरी गोस्वामी जी 1954 को इस दुनिया से रूखसत हो गये।



