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याद बाकी…… बात बाकी……

जिन्होंने अंचल को रूपहले पर्दे से रूबरू कराया

स्व. नीलकंठ राव तुकाजी राव साकरकर

लेखक – जसवंत पवार

आरे..आरे..आरी..नीं….नीं… आजारे निंदिया..बिटिया को सुला जा…हूं…हूं.. रूपहले पर्दे पर एक सभ्रांत परिवार की महिला अपनी छोटी सी बेटी को पालने पर सुलाते हुए बड़ी ही मधुर स्वर में लोरी गुनगुनाते रहती है। सिल्वर स्क्रीन पर दर्शकों के लिए यह कौतुहल का दृश्य था, वह भी सवाक चलचित्र…दर्शक मंत्रमुग्ध थे..चेहरा आश्चर्य और जिज्ञासा के भाव से ओतप्रोत, आंखे फटी की फटी और टकटकी लगाए पर्दे को निहार रही थी। दर्शकगण यह सवाक  दृश्य देखकर आपस में सरगोशियां कर रहे थे। यह दृश्य था तत्कालीन महासमुंद ग्राम के श्रीराम टॉकीज में लगे ‘‘निर्मला’’ फिल्म में उपस्थित दर्शकों की। 1938 में महासमुंद में पहली छबीगृह का निर्माण नीलकंठ तुकाजी राव साकरकर ने कराया जिसका नाम उन्होंने श्रीराम टॉकीज रखा। इसी टॉकीज में देविकारानी और अशोक कुमार अभिनीत फिल्म निर्मला चल रही थी। निर्मला मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित उपन्यास पर आधारित फिल्म थी। महासमुंद उस समय आस-पास के गांव से बड़ा था तथा यहां पर एक छोटा सा रेल्वे स्टेशन हुआ करता था। रेल्वे की सुविधा को देखते हुए नीलकंठ राव जी ने यहां पर टॉकीज का निर्माण कराया था। अपने छोटे भाई रिखीराम साकरकर जी के सहयोग से, जोे कि एक सिविल इंजीनियर थे। अंग्रेजों की हुकुमत थी। टॉकीज क्षेत्र में भी बसाहट कम थी झाड़-झंखाड़ और जंगल था। नीलकंठ राव जी के पोते दीपक व प्रकाश राव साकरकर बतलाते हैं कि दादा जी लोग तुमसर, भंडारा (सीपी एण्ड बरार) से सहपरिवार व्यापार के सिलसिले में आए थे। वे लोग सात भाई थे। नीलकंठ राव, तुकाजी राव साकरकर के सबसे बड़े पुत्र थे। ये दंबग कदकाठी और गौरवर्ण के मालिक थे झक सफेद धोती कुर्ते में इनका रूप लावण्यता देखते बनता था। रायपुर, महासमुंद  और खरियार रोड में दलहन, तिलहन, राईस मील, आरामील, सिनेमा हॉॅल और मवेशी का व्यापार था। क्षेत्र में इनकी 25 प्रतिशत की जमींदारी थी। साकरकर जी का खरियार रोड और कोमाखान के राजपरिवार से मधुर संबंध थे। नीलकंठ राव जी मैट्रीक तक शिक्षिति थे। 1938 में महासमुंद में बिजली नहीं आई थी। यहां टॉकीज मे फिल्म भाप के दबाव से जनरेटर का टरबाइन घुमाकर बिजली उत्पादन करके प्रोजेक्टर से फिल्म चलायी जाती थी या कहा जाए भाप से बिजली बनाकर फिल्म चलायी जाती थी। इस जनरेटर को नीलकंठ राव जी मुंबई से मंगवाये थे। बतलाते हैं उस समय निर्मला फिल्म खूब चली थी। सन् 1938 में निर्मला के अतिरिक्त वचन और भाभी फिल्में आई। बोलती-सवाक फिल्म अंचल के लोगों के लिए आश्चर्य का विषय था तथा मनोरंजन का कोई दूसरा साधन नहीं होने के कारण आस-पास, राजिम, बागबाहरा, पिथौरा क्षेत्र, आरंग व महानदी के उस पार के लोग, ट्रेन, साइकिल, बैैलागाड़ी व पैदल के पैदल फिल्म देखने आते थे, टिकटों के लिए चील-झपट्टा होता था। श्री राम टॉकीज में फिल्में दो शो में चलती थी 6 से 9 व 9 से 12 बजे रात तक। गुरुवार और रविवार महासमुंद का हाट-बाजार का दिन होता था, उस दिन टॉकीज में तीन शो का आयोजन होता। दीपक साकरकर जी बतलाते हैं कि हम लोग तो उस बखत पैदा भी नहीं हुए थे। पर हमारे बुजुर्ग बतलाते रहे हैं कि टॉकीज के लिए चार आपरेटर, दो बुकिंग खिड़की जिसमें अपर, लोवर और बालकनी का टिकट एक पैसा, दो पैसा व दौ पैसे में वितरण होता था।

महिलाओं के लिए अलग बैठक व्यवस्था व महिला गेटकीपर रखे जाते थे। हुडदंगियों को गेट कीपर लोग ही ठीक कर देते थे।  नीलकंठ राव जी के एक पुत्र भुवनेश्वर राव साकरकर जी हुए उन्हीं के पुत्र दीपक और प्रकाश साकरकर जी है। प्रकाश साकरकर जी आगे बतलाते हैं कि उनके पिता भुवनेश्वर राव साकरकर जी बतलाते  थे कि 1938 से 1960 के बीच सिकंदर, किस्मत, शहीद, महल जिसके गाने आएगा… कोई आने वाला आएगा व मुश्किल है बहुत मुश्किल.. गाना जिसे लता मंगेशकर ने गाया था को फिल्म और गाने के साथ-साथ लता जी को भी प्रसिद्धी  मिली। आवारा, बैजूबावरा, अनारकली, मिर्जागालिब, देवदास, प्यासा, मदर इंडिया, तुझसा नहीं देखा, मुगल-ए-आजम, बम्बई का बाबू और उसने कहा था जैसी ऐतिहासिक, सामाजिक और रोमांटिक फिल्मो का दौर था जो कि उसका स्वर्णयुग कहा जाता है। महासमुंद में फिल्म  व्यवसाय की सफलता को देखते हुए नीलकंठ राव जी ने 1961  में श्री बिठोबा टॉकीज का निर्माण कराया जिसमें पहली फिल्म ‘संपूर्ण रामायण’ लगी थी।  यह धार्मिक फिल्म अच्छी चली थी। फिल्म की रीलें आमरावती और भुसावल से ट्रेन के माध्यम से आती थी। टॉकीज में चल रही और आने वाली फिल्मों का प्रचार-प्रसार बैलगाड़ी, रिक्शा और जीप पर समय के साथ होते रहा और फिल्मों का पोस्टर मेरिट के आधार पर आता था। कम से कम 60 पोस्टर और 4 से 10 फोटो सेट जोे टॉकीज के अंदर लगते हैं आते थे। महासमÞुंद और आस-पास  के गांव में लगने वाले फिल्मी बोर्डों को मिश्रा पेंटर, गणेश पेंटर और बंजारी पेंटर बनाते थे। अंचल का पहला छबिगृह श्रीराम टॉकीज कोविड से पहले बंद होे चुका है। श्री विठोबा टॉकीज इस इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों की दौड़ में भी अपने पूर्वज की प्रतिष्ठा को बनाएं रखा है। श्री राम टॉकीज को नए स्वरूप में लोगों के लिए सहेजने की तैयारी है। अलबत्ता ट्रूरिंग टॉकीज के दौर से पहले महासमुंद को स्थायी छबिगृह एवं बोलती फिल्म से परिचय कराने वाले व महामसुंद ग्राम पंचायत के प्रथम अध्यक्ष नीलकंठ राव जी इस दुनिया से 1966 को फना हो गए।

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