जांजगीर-चांपा। हाई स्कूल ग्राउंड में चल रही उपनिषद ज्ञानामृत प्रवचन श्रृंखला के तेरहवें दिन मंगलवार को पूजनीया रासेश्वरी देवी ने ज्ञानयोग और भक्तियोग का भेद समझाया। उन्होंने कहा कि कोरे ज्ञान से नहीं, भक्ति से मिलने वाला ईश्वरीय प्रेम ही मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य है। देवी जी ने कहा कि ज्ञानी अपने बल से तमोगुण और रजोगुण को जीतकर निर्विकल्प समाधि तक पहुंच सकता है, लेकिन सत्वगुण को जीतने के लिए उसे भी भगवान की भक्ति करनी पड़ती है। अद्वैतवाद के प्रवर्तक शंकराचार्य ने भी इसी कारण सगुण साकार श्रीकृष्ण की भक्ति की थी। ज्ञानी और भक्त के आनंद में अंतर बताते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञानी का ब्रह्मानंद गुड़ की चाय जैसा है, जबकि भक्त का प्रेमानंद मिश्री की चाय जैसा अधिक मधुर है। इसीलिए राजा जनक, शुकदेव और उद्धव जैसे परम ज्ञानी भी ज्ञान छोड़कर भक्ति में डूब गए। सच्ची भक्ति करने से ज्ञान और वैराग्य स्वतः आ जाते हैं। उन्होंने कहा कि पूर्ण विरक्त ज्ञानी ज्ञान मार्ग का और घोर आसक्त व्यक्ति कर्म मार्ग का अधिकारी है। हम संसारी लोग कभी आसक्त तो कभी विरक्त हो जाते हैं, ऐसी चंचल अवस्था वालों के लिए कलियुग में भक्ति मार्ग ही सबसे सुलभ और सर्वश्रेष्ठ है। प्रवचन श्रृंखला 8 अक्टूबर तक चलेगी। कथा स्थल पर ही 4 से 8 अक्टूबर तक रोज सुबह 7.30 से 9 बजे तक रूप ध्यान साधना सत्र आयोजित किया गया।



