अवसरवादियों के लिए यह तालाब बना हुआ है स्थायी चारागाह
चांपा। नब्बे के दशक से ही स्थानीय राजनीति का केंद्र रहा रामबांधा तालाब इन दिनों अपनी बदहाली को लेकर एक बार फिर सुर्खियों में है। पिछले पैंतीस-छत्तीस वर्षों के इतिहास को देखें, तो यह ऐतिहासिक तालाब कभी भाजपा के लिए आंदोलन का हथियार बना, तो कभी कांग्रेस के लिए चुनावी मुद्दा। विडंबना यह है कि पिछले तीन दशकों में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों की ‘नगर सरकारों’ ने तालाब की सफाई और सौंदर्यीकरण के नाम पर छोटे-बड़े निर्माण कार्यों के माध्यम से लगभग 20 करोड़ रुपये से अधिक की राशि पानी की तरह बहा दी। इसके बावजूद, जमीनी हकीकत आज भी जस की तस बनी हुई है। राजनीति और बजट का यह खेल साल 1990 से बदस्तूर जारी है। जब पूरा तालाब पहली बार जलकुंभी से पटा था, तब अविभाजित मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। हालांकि, स्थानीय निकाय चुनाव न होने के कारण नगर पालिका की कमान मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) और अनुविभागीय राजस्व अधिकारी (एसडीएम) के हाथों में थी। उस दौर में जब भाजपा ने तालाब से जलकुंभी हटाने के लिए उग्र आंदोलन की चेतावनी दी, तब कहीं जाकर प्रशासनिक अमला जागा और सफाई कार्य शुरू हुआ। इसके बाद साल 1994 के नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस की नगर सरकार बनी। लेकिन इसी बीच अगले सात आठ सालों में रखरखाव के अभाव के कारण जलकुंभी ने दोबारा पूरे तालाब को अपनी आगोश में ले लिया। जनता का आक्रोश चरम पर था और इसी दौरान नवीन जांजगीर चांपा जिले का गठन हुआ।जिला बनते ही रामबांधा तालाब तत्कालीन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के लिए कथित तौर पर ‘चारागाह’ बन गया। जनवरी 1999 में एक बड़ा फैसला लेते हुए पूरे तालाब को सुखाकर उसकी गहरी खुदाई कराई गई, और तटबंधों पर सौंदर्यीकरण का रास्ता साफ किया गया। साल 1999 के अंत में सत्ता बदली और नगर पालिका में भाजपा की सरकार आई, जिसमें अनुपम श्रीवास्तव अध्यक्ष बने। इसके बाद तालाब की भूमि पर धड़ाधड़ विभिन्न निर्माण कार्यों की आधारशिला रखने का दौर शुरू हुआ। नगर पालिका में लगातार 15 वर्षों तक भाजपा का दबदबा रहा, जहां अनुपम श्रीवास्तव के बाद शकुंतला सिंह और फिर प्रदीप नामदेव ने परिषद की कमान संभाली। भाजपा के इस लंबे कार्यकाल के बाद सत्ता की चाबी फिर कांग्रेस के हाथ आई और राजेश अग्रवाल अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने भी शहरवासियों को रामबांधा तालाब के कायाकल्प का सपना दिखाया। उनके कार्यकाल में भी तालाब का पानी खाली कराकर खुदाई कराई गई, पैदल पथ (पाथ-वे) का निर्माण हुआ और वृक्षारोपण जैसे कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। कुछ सालों तक तो तालाब की स्थिति ठीक रही, लेकिन दूरदर्शिता और स्थायी समाधान की कमी के कारण पिछले आठ-दस वर्षों में जलकुंभी ने तीसरी बार पूरे तालाब पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। वर्तमान परिदृश्य को देखें तो चक्र घूमकर फिर वहीं आ गया है। इस समय नगर पालिका में भाजपा की परिषद है और प्रदीप नामदेव अध्यक्ष की कुर्सी पर हैं। ऐसे में विपक्ष में बैठी कांग्रेस को बैठे-बिठाए एक बड़ा स्थानीय मुद्दा मिल गया है, जो सत्तापक्ष के लिए इस वक्त सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हो रहा है। रामबांधा तालाब के इस 35 साल के सियासी सफरनामा से यह साफ है कि इस बदहाली के लिए केवल किसी एक दल या नेता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह सामूहिक प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का जीवंत उदाहरण है, जहां दल बदलते रहे, चेहरे बदलते रहे, करोड़ों के बजट ठिकाने लगते रहे, लेकिन अगर कुछ नहीं बदला… तो वह है रामबांधा तालाब का भाग्य।
जब 99 एकड़ के वैभव को शब्दों और नाटकों में पिरोया गया–राजनीतिक उपेक्षा का दंश झेल रहे रामबांधा तालाब का अतीत बेहद गौरवशाली रहा है। कभी 99 एकड़ के विशाल भू-भाग में फैले इस तालाब का विहंगम दृश्य देखकर अंचल के साहित्यकारों ने भी समय-समय पर इसके सौंदर्य को अपने शब्दों में पिरोया है। इनमें जांजगीर के मूर्धन्य साहित्यकार विद्या भूषण मिश्र, चांपा के साहित्यकार सुरेन्द्र नाथ, डॉ. रमाकांत सोनी और महेश राठौर प्रमुख हैं। रंगकर्मी अनंत थवाईत ने तो रामबांधा तालाब के संरक्षण और इसकी इस दुर्दशा को लेकर 24 सितंबर 2019 को बकायदा नुक्कड़ नाटक तक खेला था, ताकि सोए हुए प्रशासन को जगाया जा सके। अफ़सोस, जिन लहरों ने कभी कलमकारों को प्रेरित किया, वे आज प्रशासनिक उदासीनता की जलकुंभी के नीचे दम तोड़ रही हैं। राम बांधा तालाब की वर्तमान हालात को देखकर हम तो शासन प्रशासन से यही कहेंगे कि नागरिकों को तालाब का कायाकल्प करने का सपना दिखाकर करोड़ों रुपए का भारी भरकम बजट तैयार न करें और कुछ लाख रुपयों मे केवल जलकुंभी को ही तालाब से बाहर निकलवाने का कार्य करें जिससे लोगों को निस्तारण के लिए तुरंत राहत मिल सके। एक सवाल यह भी …यदि मान लिया जाए कुछ कारण वश शासन इस तालाब के लिए बजट स्वीकृत नहीं करती है तो क्या पार्षद मद की राशि से सफाई कार्य नहीं हो सकता? नगर मे 27 पार्षद और 5 नामांकित पार्षद हैं यदि ये अपने मद से एक एक या दो दो लाख रुपए भी देते हैं तो क्या तीस चालीस लाख रुपए मे तालाब की सफाई नहीं हो सकता?



