तीन साल में पहली बार पर दिवाली की तिथि को लेकर उत्तर से दक्षिण तक कोई विवाद नहीं उठा। ग्रह-नक्षत्रों की चाल और काशी से उठे पंचांगों की एकरूपता अभियान के चलते ऐसा संभव हो पाया है। पिछले तीन साल में काशी विद्वत परिषद और बीएचयू के ज्योतिष विभाग की ओर से भारत भर के 100 से ज्यादा पंचांगों का अध्ययन और अंतरराष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन कर उन्हें एकमत किया गया।
सत्र 2026-27 के पंचांगों की एकरूपता में आने से एक तिथि और एक पर्व की धारणा सामने आई। एकरूपता कार्य के समन्वयक रहे बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय ने बताया कि इस बार ग्रह-नक्षत्रों का मान ही है ऐसा है कि दिवाली को लेकर तिथि विवाद नहीं है। हर बार अमावस्या सूर्यास्त के आसपास शुरू होकर अगले दिन सूर्यास्त तक होती थी। इसके कारण तिथि को लेकर कुछ लोगों की ओर से शास्त्रीय वचनों का ठीक से व्याख्या न करने के चलते भ्रम की स्थिति बन जाती थी। इस बार स्थितियां अलग हैं। अमावस्या एक ही दिन आठ नवंबर की अर्द्धरात्रि और प्रदोष काल में रहेगी इसलिए इस साल एक ही दिन दिवाली मनाई जानी है। सूर्यास्त से लेकर दो घंटे 24 मिनट तक प्रदोष काल होगा। इसी में लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है।



