पत्रकारवार्ता के दौरान धर्मांतरण को बताया पाप, युवाओं को नशे से दूर रहने का दिया संदेश
जांजगीर-चांपा। जयपुरिया परिवार द्वारा बहनीडीह में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में कथा वाचन करने पहुंचे स्वामी अनिरुद्धाचार्य महाराज ने छत्तीसगढ़ की जनता की सहजता और सरलता की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के लोग निश्चल और पवित्र हृदय के स्वामी हैं। पवित्र हृदय में ही भगवान का वास होता है। जांजगीर-चांपा जिले में पहली बार कथा वाचन के लिए पहुंचे अनिरुद्धाचार्य महाराज ने पत्रकारों से चर्चा के दौरान कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती पावन है और यहां के लोगों का हृदय भी पवित्र है। उन्होंने बताया कि अब तक उनके द्वारा 500 से अधिक कथाएं की जा चुकी हैं। उन्होंने वर्ष 2008 में 18 वर्ष की उम्र में पहली कथा की थी। वर्तमान में उनकी उम्र 35 वर्ष है। उन्होंने बताया कि कथा के माध्यम से अब तक हजारों लोगों ने शराब का त्याग किया है। इसी तरह बड़ी संख्या में लोगों ने मांसाहार भी छोड़ा है। उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि एक कसाई ने उनकी कथा सुनी और उसके हृदय में परिवर्तन आया। इसके बाद उसने जानवरों की जान लेना छोड़ दिया। धर्मांतरण से जुड़े सवाल पर अनिरुद्धाचार्य महाराज ने कहा कि धर्म परिवर्तन करना और करवाना, दोनों ही पाप हैं। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए लोगों को अपने धर्म के प्रति जागरूक रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर करना श्रेष्ठ है, लेकिन धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। गौ माता से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि गौ माता को राष्ट्र माता का दर्जा दिया जाना चाहिए। उन्होंने गोसेवा और गौ संरक्षण को सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। हाल में रिलीज हुई फिल्म ‘हनुमान’ से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है कि अब बॉलीवुड में सनातनी विषयों पर फिल्में बन रही हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में साधु-संतों के जीवन चरित्र पर भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से फिल्में बननी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, सभ्यता और उसके वैज्ञानिक इतिहास की जानकारी मिल सके। स्वामी अनिरुद्धाचार्य महाराज ने युवा पीढ़ी को नशे से दूर रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि युवाओं को अपनी ऊर्जा और प्रतिभा का उपयोग सकारात्मक कार्यों में करना चाहिए। नशा व्यक्ति के साथ-साथ परिवार और समाज को भी प्रभावित करता है। अनिरुद्धाचार्य महाराज ने बताया कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके गृह ग्राम में हुई। आगे की शिक्षा के लिए वे अयोध्या और वृंदावन गए। उनके गुरु स्वामी गिरिराज शास्त्री जी थे, जिनका गोलोक गमन हो चुका है। मनुस्मृति से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में समाज को बांटने की बात नहीं है। उन्होंने सभी सनातनी भाई-बहनों से मिल-जुलकर और एकजुट होकर रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि समाज की मजबूती एकता में ही है।



