रायपुर, (संवाद साधना)। रायपुर की शान, जंगल सफारी की पहली बंगाल टाइगर बिजली अब इतिहास बन गई है। मात्र 8 वर्ष की उम्र में यह बाघिन गुजरात के जामनगर स्थित वंतारा वाइल्डलाइफ रेस्क्यू सेंटर में इलाज के दौरान दम तोड़ गई। इलाज में हुई देरी, प्रशासनिक अनुमति की बाधाएं और लंबी यात्रा ने मिलकर इस प्रदेश के गर्व की जान ले ली। अब सवाल उठ रहा है, क्या वक्त पर कदम उठाया जाता तो बिजली बच सकती थी?
असम से रायपुर तक की बाघों की कहानी
शंकरी की मौत के बाद वर्ष 2012 में नंदनवन चिडिय़ाघर में असम से तीन बाघों को लाया गया था, शिवाजी, रागिनी और दो वर्ष की किशोरी
इन्हीं में से किशोरी ने वर्ष 2017 में पहली बार एक शावक को जन्म दिया, जिसे नाम मिला बिजली। यह वही बाघिन थी, जिसने रायपुर के जंगल सफारी में पहली बंगाल टाइग्रेस के जन्म की ऐतिहासिक पहचान दी थी।
गैस्ट्रो समझा गया, निकला यूट्रस और किडनी इंफेक्शन
अप्रैल में दो शावकों के जन्म देने के बाद बिजली के स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी, अगस्त में और ज्यादा स्थिति खराब हो गई थी। शुरुआत में डॉक्टरों ने बीमारी को गैस्ट्रो-इंटेस्टाइनल समस्या समझा और उसी हिसाब से इलाज शुरू किया गया, लेकिन जब उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ तो अल्ट्रासाउंड और हेमेटोलॉजिकल टेस्ट में पाया गया कि उसकी किडनी कमजोर हो चुकी थी और गर्भाशय (यूट्रस) में संक्रमण फैल गया था। इसी के बाद वन विभाग ने उसे वंतारा वाइल्डलाइफ रेस्क्यू सेंटर, जामनगर भेजने का निर्णय लिया।
मगर इस निर्णय पर अमल में 10 दिन की देरी हो गई, क्योंकि केंद्रीय चिडिय़ाघर प्राधिकरण से अनुमति मिलने में इतना समय लग गया।
लंबी यात्रा, कमजोर शरीर और अधूरा इलाज
7 अक्टूबर को बिजली को शाम 4 बजे हावड़ा-अहमदाबाद एक्सप्रेस से जामनगर रवाना किया गया। 8 अक्टूबर को शाम 4 बजे अहमदाबाद स्टेशन पहुंचेने के बाद बिजली को 350 किलोमीटर सडक़ मार्ग से सफर कर 9 अक्टूबर वंतारा पहुंची और 10 अक्टूबर की रात उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। और उसकी मौत हो गई। वन विभाग ने पुष्टि की कि वह पिछले 10 दिनों से खाना-पीना छोड़ चुकी थी। वंतारा की पशु चिकित्सा टीम ने बताया जब बिजली हमारे पास पहुंची, तब वह बेहद कमजोर और डिहाइड्रेटेड थी। उसके किडनी फंक्शन लगभग बंद थे और संक्रमण पूरे शरीर में फैल चुका था।
अगर समय पर इलाज मिलता तो बच जाती जान : मेनका गांधी
इस घटना ने पशु अधिकार कार्यकर्ताओं में भी नाराजगी फैला दी है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी ने कहा कि मुझे बाघिन की मौत की खबर मिली है, वंतारा में इलाज की व्यवस्था अच्छी है, लेकिन छत्तीसगढ़ वन विभाग ने देर कर दी। अगर उच्च अधिकारी समय पर एक्शन लेते तो शायद बिजली आज जिंदा रहती।
जंगल और जू में उम्र का फर्क
बिजली की मौत के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि जंगल में बाघों की औसत आयु 10 से 15 वर्ष ही क्यों होती है, जबकि चिडिय़ाघरों में 20 से 25 वर्ष तक वे जीवित रहते हैं। जंगल में भोजन के लिए खुद शिकार करना पड़ता है। स्वतंत्रता पूर्ण स्वतंत्रता सीमित क्षेत्र देखभाल प्राकृतिक परिस्थितियां पशु चिकित्सकीय निगरानी होती है।
पूर्व आइएफएस केके बिसेन के कहा कि बिजली सिर्फ एक बाघिन नहीं
थी
वह रायपुर जंगल सफारी की पहली संतति, छत्तीसगढ़ के वन्यजीव संरक्षण की जीवित पहचान और देश के राष्ट्रीय पशु की एक गर्वीली प्रतिनिधि थी। इसके समय रहते इलाज नहीं होने के कारण मौत हो गई है। भविष्य में ऐसी घटना न हो, इसके लिए चिकित्सकों की भर्ती होनी चाहिए।
वर्जन
वंतारा से सूचना ंिमली कि बाघिन बिजली की मौत हो गई, जिसके बाद जंगल सफारी डीएफओ गुजरात रवाना हुए। पोस्टमार्टम के बाद गुजरात में ही राष्ट्रीय नियम के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाएगा। बाकी मौत के कारणों के बारे में गहन जांच किया जाएगा।
-अरुण कुमार पांडे, पीसीसीएफ, वाइल्ड लाइफ



