महासमुंद। मुख्यालय से लगभग 24 किमी दूर खल्लारी मातेश्वरी मंदिर विख्यात है। यहां क्वांर और चैत्र में भव्य नवरात्र पर्व का आयोजन किया जाता है। मनोकामना कलश की स्थापना के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। ग्राम खल्लारी को पुरातनकाल में मृतकागढ़ के नाम से जाना जाता था। फिर बाद में इसे खल्लवाटिका के नाम से जाना गया, किंतु अब यह स्थान ग्राम खल्लारी के नाम से प्रसिद्ध है।
बता दें कि यह स्थल राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-353 में महासमुंद और बागबाहरा के मध्य सड़क मार्ग से महज 2 किमी की दूरी पर है, जो खल्लारी मुख्य सड़क व रेल मार्ग से जुड़ा है। यहां खल्लारी मातेश्वरी का दो प्रमुख मंदिर है। पहला मंदिर गांव की पहाड़ी और दूसरा मंदिर यहां गांव में ही है। खल्लारी का तात्पर्य खल और अरी अर्थात् शत्रुओं का नाश करने वाली है। जो अब असंख्य श्रद्धालुओं की आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। यहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। खल्लारी मातेश्वरी पहाड़ हरे-भरे वृक्ष व लताओं से आच्छादित 355 फीट ऊंची सुरम्य पहाड़ी पर है, जिसकी मनोहारी दृश्य काफी आकर्षक है। मां के दर्शन के लिए इस पहाड़ी में कुल 981 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। पहाड़ी का क्षेत्रफल लगभग 280 एकड़ और सड़क मार्ग से मां खल्लारी मंदिर की दूरी लगभग 1672 फीट लंबी है। खल्लारी का कुल क्षेत्रफल लगभग 20 हजार 137 एकड़ में फैला हुआ है। यहां अब करोड़ों की लागत से खल्लारी मातेश्वरी पहाड़ी में माता के दर्शन के लिए पहाड़ी तक पहुंचने के लिए डोंगरगढ़ की तर्ज पर यहां भी रोप-वे (उड़नखटोला/लिफट) शुरू हो गई है।
बेमचा से हुआ है मां खल्लारी का आगमन
खल्लारी मातेश्वरी का आगमन महासमुंद के निकट ग्राम बेमचा से हुआ है। मां खल्लारी युवती (षोड़सी) का रूप धारण कर विशाल साप्ताहिक बाजार भ्रमण कर खल्लारी से होते हुए 2 किमी दूर गुजन पहाड़ी निवासी अपनी बहन खोरपा से मिलने जाती थीं। एक दिन एक बंजारा राजा के मन में खल्लारी माता का मनमोहक रूप कौंध गया और राज हठ द्वारा पाने की चेष्टा करने लगा। बंजारा राजा माता खल्लारी के प्रेम में वशीभूत होकर बाजार वापसी के समय उनका पीछा करने लग गया। इस पर माता ने अनेक बार राजा (बंजारा) को समझाया कि -तू जिसे साधारण नारी समझकर पीछा कर रहा है, वह तेरी भूल है। जबकि मैं तुम्हारे गांव बेमचा की कुलदेवी खल्लारी माता हूं। पर, बंजारा राजा उनके सौंदर्य पर इतना आसक्त हो गया था कि उसे धर्म-अधर्म नीति-अनीति का कुछ भी ध्यान नहीं रहा और कामांध बंजारा राजा ने पीछा करना नहीं छोड़ा। तब कुपित होकर नारी स्वरूपा मां खल्लारी ने बंजारा राजा को चेतावनी दी कि वह उनका पीछा करना छोड़ दे और कहा कि यदि बंजारा तू खल्लारी के पहाड़ तक आया तो पत्थर में परिवर्तित हो जाएगा। फिर भी बंजारा राजा ने पीछा नहीं छोड़ा। अंतत: माता के श्राप के कारण वह पत्थर में परिवर्तित हो गया। उक्त घटना के बाद खल्लारी माता, खल्लारी के विशालतम पहाड़ी में समा गईं और उस स्थान पर खल्लारी माता ने अपने हाथ की ऊंगली को पहचान स्वरूप पहाड़ पर रहने दिया। बाद खल्लारी माता के स्वप्न देने पर उसी ऊंगली के स्थान पर उस विशालतम पहाड़ में ग्रामीणों के सहयोग से माता का मंदिर बनवाया गया। तब मंदिर का स्वरूप काफी छोटा था। यहां बीते कुछ सालों पहले पहाड़ी पर करोड़ों की लागत से खल्लारी मातेश्वरी का भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया।
मूर्ति स्थापना के लिए स्वप्न में दिया था आदेश
ग्राम खल्लारी में प्रवेश करने पर खल्लारी माता का एक और मंदिर है। उक्त मंदिर के संबंध में बताया जाता है कि यहां के एक मालगुजार को पहाड़ा वाली खल्लारी माता ने स्वप्न में आदेश दिया कि मेरी फेंकी गई कटार (त्रिशूल) जहां भी गिरे वहीं पर मूर्ति स्थापित की जाए, क्योंकि वृद्ध और कमजोर भक्त पहाड़ चढ़ नहीं पाएंगे। अत: उन्हें इस स्थल (मंदिर) पर भी उतना पुण्य मिलेगा, जितना पहाड़ पर मंदिर आने पर मिलता है। बाद उस स्थान पर भी मंदिर का निर्माण कराया गया। उक्त स्थान आज माता राऊर के नाम से प्रसिद्ध है। वर्तमान में इन दिनों करोड़ों की लागत से इस स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है। जहां नवरात्रि के दोनों पर्व में पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना होती है। खल्लारी मातेश्वरी पहाड़ में नव दिवसीय प्रसाद स्वरूप अनवरत भोजन भंडारा का भी भव्य आयोजन होता है। खल्लारी में नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है। यहां प्रति वर्ष चैत्र पूर्णिमा मेला श्रद्धालुओं का आकर्षण का केंद्र रहता है।
द्वापर युग में पांडवों ने बिताया था समय
खल्लारी के इतिहास में यदि हम द्वापर युग पर नजर डालें तो पांडव इस अंचल से गुजरे व अपना कुछ समय खल्लारी में बिताया। भीम ने अपना पैर चट्टान पर पूरी शक्ति के साथ दबाया, जहां-जहां पैर पर बल दिया गया वहां-वहां उनका पैर चट्टान में धंस गया। इस दृश्य को देख हिडिम्बनी प्रसन्न हो गई और माता खल्लारी के समक्ष उन्होने गंधर्व विवाह कर लिया। आज भी पहाड़ी में भीम से संबंधित अनेक चिह्न देखने को मिलते हैं। वहीं गांव के एक खेत में लाक्षागृह का अवशेष है।
2321 ज्योत प्रज्ज्वलित
खल्लारी मातेश्वरी मंदिर से धार्मिक मान्यता भी जुड़ी हुई है कि यहां संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी जरूर होती है। नि:संतान दंपत्ति आस्था व श्रद्धा के साथ संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर पहुंचती हैं। इस साल यहां पहाड़ी वाले मंदिर में 1635 एवं नीचे स्थित मंदिर में 686 ज्योत कुल 2321 ज्योत दोनों मंदिरों में श्रद्धालुओं ने प्रज्ज्वलित कराएं हैं।



