2013 में निर्दलीय विधायक निर्वाचित होकर डॉ चोपड़ा ने बनाया था रिकॉर्ड
महासमुंद। वर्ष 1998 में जिला बनने के बाद से इस बार जिले में छठवां विधानसभा चुवान होने जा रहा है। जिले में हमेशा से कांग्रेस और भाजपा ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी रही हंै। वर्ष 2003 और 2013 के चुनाव को छोड़ महासमुंद विधानसभा में कांग्रेस का ही दबदबा रहा है। महासमुंद विधानसभा से वर्ष 2013 में भाजपा से बगावत कर कैंची छाप से चुनाव मैदान में उतरे डॉ. विमल चोपड़ा प्रदेश में इतिहास रचते हुए पहले निर्दलीय विधायक चुने गए थे। शेष विधानसभा चुनाव में तीन बार कांग्रेस तो एक बार भाजपा पर यहाँ की जनता ने भरोसा जताया है।
महासमुंद विधानसभा में पार्टी से बगावत कर निर्दलीय या अन्य पार्टी से चुनाव मैदान में उतरने वालों पर भी जनता ने बड़ी संख्या में भरोसा जताया है । जिसका उदाहरण है वर्ष 2018 का विधानसभा चुनाव। हम यहाँ आज केवल महासमुंद विधानसभा चुनाव की चर्चा करेंगे। वर्ष 2018 में कांग्रेस से प्रत्याशी विनोद सेवनलाल चंद्राकर, भाजपा से पूनम चंद्राकर, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ से त्रिभुवन महिलांग, निर्दलीय प्रत्याशी मनोजकांत साहू, निर्दलीय प्रत्याशी डॉ. विमल चोपड़ा के अलावा आम आदमी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी सहित 11 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विनोद सेवनलाल चंद्राकर ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के पूनम चंद्राकर को 23066 मतों से पराजित किया था। विनोद चंद्राकर को कुल 49 हजार 356 मत मिले और भाजपा के पूनम चंद्राकर को 26 हजार 290 वोट मिले थे।
चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 31.91 रहा वहीं भाजपा का वोट प्रतिशत मात्र 17 प्रतिशत ही था। वर्ष 2003 से 2013 तक की अपेक्षा 2018 में भाजपा और कांग्रेस का वोट प्रतिशत काफी गिरा , जिसके पीछे अपनी पार्टी से बगावत कर निर्दलीय या अन्य पार्टी से चुनाव मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों को माना जा रहा है ,और यह बात किसी हद तक सही भी मानी जा सकती है। इस चुनाव में भाजपा से जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ में गए त्रिभुवन महिलांग को 24 हजार 839 वोट,निर्दलीय प्रत्याशी मनोजकांत साहू को 21 हजार 911, निर्दलीय प्रत्याशी डॉ. विमल चोपड़ा को 21 हजार 160 वोट प्राप्त हुए थे। इन तीनों को प्राप्त 67 हजार 910 वोट कुल मतदान का 43 प्रतिशत है। यदि उक्त तीनों चुनाव मैदान में न होते तो यह वोट भाजपा और कांग्रेस में ही जाते। शेष निर्दलीय और अन्य पार्टी 11 प्रत्याशियों को कुल 9 हजार 38 वोट ही मिले जो कुल मतदान का 5.8 प्रतिशत ही होता है वहीं नोटा को 2 हजार 85 वोट, 1.35 प्रतिशत रहा। कुल मिलाकर किसी भी चुनाव में पार्टी से नाराज होकर निर्दलीय या अन्य पार्टी से चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी की हार-जीत में बहुत बड़ी भूमिका होती है।
इस बार निर्दलीय की क्या भूमिका होगी ?
आसन्न विधानसभा चुनाव के लिए जिले की चारों विधानसभा में भाजपा ने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। कांग्रेस से प्रत्याशी जल्द ही घोषित होने वाली है। गुरूवार को ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस ओर इशारा करते हुए कहा है कि दिल्ली में होने वाली केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक में सभी प्रत्याशियों के नाम तय कर लिए जाएंगे और पहली सूची 15 अक्टूबर तक जारी होगी। अब देखना यह कि नवरात्रि के पहले दिन अगर पहली सूची जारी होती है तो महासमुंद विधानसभा से पार्टी किसके नाम पर मुहर लगाती है। बहरहाल, भाजपा की पहली सूची जारी होने के बाद सरायपाली से बगावती सुर उठे और भाजपा के श्याम ताण्डी ने इस्तीफा देकर कांग्रेस का दामन थाम लिया। फिलहाल तो खल्लारी, बसना और सरायपाली से किसी भी भाजपाई के निर्दलीय चुनाव लड़ने की जानकारी नहीं है। इधर, भाजपा की दूसरी सूची जारी होने के बाद डा विमल चोपड़ा को टिकट न दिए जाने से उनके समर्थक नाराज हंै और गुरूवार को ही वे अपने नेता पर निर्दलीय चुनाव लड़ने का आग्रह कह रहे हैं। भाजपा की दूसरी सूची में महासमुंद से भाजपा जिला उपाध्यक्ष योगेश्वर राजू सिन्हा और बसना से पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष और नीलांचल सेवा समिति के संयोजक संपत अग्रवाल को अपना प्रत्याशी घोषित किया है। जिसके बाद से महासमुंद विधानसभा में बगावती सुर सुनाई देने लगे हैं। फिलहाल मान मनौव्वल का दौर जारी है। बता दें कि भाजपा से टिकट न मिलने से नाराज डॉ. चोपड़ा ने वर्ष 2013 में निर्दलीय चुनाव लड़ कर छत्तीसगढ़ में पहले निर्दलीय विधायक बनने का गौरव हासिल किया था। इस चुनाव में उन्होंने अपने निकटम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के अग्नि चंद्राकर को 4 हजार 722 मतों से हराया था। उनका वोट प्रतिशत 33.73 था। वर्ष 2018 में भी निर्दलीय चुनाव मैदान में थे पर सफल न हो सके। यदि इस बार भी वे निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा करते हंै तो भाजपा का बहुत बड़ा वोट बैक डॉ. चोपड़ा की ओर पलट सकता है जो भाजपा के लिए नुकसानदायक होगा । वहीं कांग्रेस के वोट बैक में भी सेंध लग सकती है और यदि कांग्रेस से भी टिकट न मिलने से कोई नाराज निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरता है तो उसे भी नुकसान झेलना पड़ेगा।



