चांपा। केंद्र की मोदी सरकार द्वारा रु. 2 हजार से अधिक के यूपीआई व्यापारी लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू किए जाने के निर्णय पर जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री एवं प्रवक्ता नागेंद्र गुप्ता ने सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर सरकार देश को कैसलेस और डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर शुल्क लगाने का रास्ता खोलना उसकी अपनी डिजिटल इंडिया की नीति के विपरीत है। उन्होंने कहा कि सरकार ने नोटबंदी के बाद देशवासियों को बार-बार डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन लेनदेन और कैशलेस अर्थव्यवस्था अपनाने के लिए प्रेरित किया था। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े व्यापारी तक क्यूआर कोड और यूपीआई भुगतान को अपनी रोजमर्रा की व्यवस्था का हिस्सा बना चुके हैं। ऐसे समय में रु 2,000 से अधिक के व्यापारी लेनदेन पर एमडीआर लगाने से व्यापारियों में अतिरिक्त लागत को लेकर चिंता पैदा होना स्वाभाविक है राशन, कपड़ा, दवा इलेक्ट्रॉनिक्स, सोना-चांदी, घरेलू सामान तथा अन्य बड़े मूल्य की खरीदारी में ग्राहक यूपीआई का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं। यदि व्यापारियों को प्रत्येक बड़े डिजिटल लेनदेन पर अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ेगा तो कुछ व्यापारी ग्राहकों को नकद भुगतान के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। इससे सरकार के ‘कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था’ के लक्ष्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। उन्होंने कहा कि विडंबना यह है कि 2017 में केंद्र सरकार ने रु 2,000 तक के भीम यूपीआई और डेबिट कार्ड लेनदेन पर एमडीआर का भार सरकार द्वारा वहन करने की नीति अपनाई थी, ताकि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिले और कैशलेस अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिले। अब सरकार इसमें शुल्क लगी जो गलत है सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए।



