राजा बदले, राजपथ बदले, बदली सत्ता की पहचान,
पर अफ़सरों की तंद्रा न टूटी, जस की तस रही पुरानी शान
कोरबा। नगर निगम कोरबा में सत्ता परिवर्तन को लगभग सात वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अफ़सोस कि निगम की कार्यशैली आज भी जस की तस बनी हुई है। सत्ता बदलते ही शासकीय भवनों से विपक्ष के नेताओं के नाम और तस्वीरें मिनटों में हटा दी जाती हैं, परंतु निगम प्रशासन आज भी कुम्भकर्णी निद्रा में लीन नज़र आता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि नगर निगम के कुछ अधिकारियों के मन से अब तक कांग्रेस का मोह भंग नहीं हुआ है। सत्ता परिवर्तन के बाद भी उनकी कार्यप्रणाली में न तो सक्रियता आई और न ही जनहित के कार्यों में कोई तेज़ी दिखी। मानो नोट छापने की दौड़ में यह भूल गए हों कि अब कमल खिल चुका है और पंजे का अस्तित्व अगले पाँच वर्षों के लिए इतिहास बन चुका है।
शहर की जनता मूलभूत सुविधाओं, विकास कार्यों और जवाबदेही की उम्मीद लगाए बैठी है, लेकिन नगर निगम का प्रशासन राजनीतिक बदलाव को स्वीकार करने के बजाय पुरानी मानसिकता के साथ काम करता दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि जब तख़्त और ताज बदल चुके हैं, तो क्या नगर निगम कोरबा का प्रशासन अब भी नहीं बदलेगा?




