जैतूसाव मठ में हर्षोल्लास के साथ मनाई गई छट्ठी की परंपरा

रायपुर, संवाद साधना। राजधानी के सबसे प्राचीन मंदिर पुरानी बस्ती स्थित जैतूसाव मठ, जहां भगवन विष्णु के दोनों अवतार श्रीराम व श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के छठे दिन छट्ठी की परंपर निभाई जाती है। गुरुवार को मंदिर मेें हर साल की भांति इस साल भी भगवान श्री कृष्ण की हर्षोल्लास के साथ छट्ठी मनाई गई। भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की गई और उन्हें कढ़ी-चावल का भोग लगाया जाता है। इसके बाद यहां भक्तों को महाप्रसाद का चावल-कढ़ी का वितरण किया गया। छत्तीसगढ़ में छट्ठी का अर्थ होता है बच्चे का नामकरण संस्कार। यह बालक के जन्म के छठे दिन उत्साह से मनाया जाता है। इसमें सभी रिश्तेदार, परिचितों को आमंत्रित किया जाता है। विधिवत जन्म समय के नक्षत्र के आधार पर पंडित बच्चे के नाम का पहला अक्षर बताते हैं। हवन, पूजन करके बच्चे का नाम रखा जाता है।
मालपुआ का भी लगाया गया भोग
श्रीठाकुर रामचंद्रजी स्वामी जैतू साव मठ सार्वजनिक न्यास के सचिव बताते हैं कि साल में दो बार भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर छठ्ठी की परंपरा 150 साल से निभाई जा रही है। मालपुआ का भोग ग्रहण करने के लिए हजारों की संख्या में भक्तगण आते हैं। इसके चलते अधिक की संख्या में मालपुआ बनाया जाता है। इसमें आटा, शक्कर, टीन तेल और घी मालपुआ बनाने में इस्तेमाल किया जाता है।
भक्तों ने किया प्रसाद ग्रहण
जैतूसाव मठ में भगवान श्रीकृष्ण के भोग के बाद भक्तों को प्रसाद वितरण किया गया। मंदिर परिसर में ही भक्तों को बिठाकर कढ़ी चावल, मालपुआ का प्रसाद वितरण किया गया। सुबह 12 बजे के बाद से प्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्तों का ताता लगा रहा।



